शनिवार, 2 जनवरी 2016
शनिवार, 23 फ़रवरी 2013
कांग्रेस पुनः छेड़ सकती है रेणके आयोग का राग
सम्पूर्ण भारत में 193 ऐसी राष्ट्रभक्त जातियां रही हैं जिनमे मल्लाह ,केवट ,निषाद ,बिन्द ,धीवर ,डलेराकहार , रायसिख ,महातम ,बंजारा , बाजीगर ,सिकलीगर , नालबंध , सांसी, भेदकूट , छड़ा , भांतु , भाट , नट ,पाल ,गडरिया, बघेल ,लोहार , डोम ,बावरिया ,राबरी ,गंडीला , गाडियालोहार, जंगमजोगी ,नाथ,बंगाली,अहेरिया,बहेलिया नायक,सपेला,सपेरा, पारिधि ,सिंघिकाट ,कुचबन्ध, गिहार अथवा कंजड आदि जो विमुक्त या घूमंतू जातियां कहलाती हैं और Criminal Law Amendment Act 1871 के अनुसार अपराधी जातियां घोषित की गयी थीं । 1871 से लेकर 31 अगस्त 1952 तक ये जातियां अंग्रेजों के बनाये इसी काले कानून का शिकार रहीं और जरायम पेशा का नाम लिए बदनामी की जिन्दगी जीती रहीं । इन जातियों को दूसरे गावों या शहरों में बसने की इजाजत नहीं थी , अपनी मर्जी का धंधा करने की अनुमति नहीं थी और तो और न्यायालय में भी इन जातियों की सुनवाई नहीं थी । आजाद भारत भी यह जातियां 5 वर्ष 16 दिन भारत वासियों की गुलाम बनी रहीं और 31 अगस्त 1952 को एक सरकारी आदेश के तहत आजाद हुयीं । उस दिन से इन जातियों को विमुक्त जातियों की संज्ञा दी गयी । 81 वर्ष की सरकारी गुलामी और सैकड़ों वर्षों की सामाजिक गुलामी के चलते ये जातियां शैक्षणिक , सामाजिक , आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक रूप से पिछड़ गयीं और आज भी दुनिया की तरक्की से दूर यह जातियां दूसरी जातियों से 64 साल पीछे हैं । इन जातियों की आबादी 15 करोड़ से भी अधिक है लेकिन इन जातियों का देश की विधायिका , न्यायपालिका और कार्यपालिका में कोई समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है , थोडा बहुत जो है भी , तो वो न के बराबर है । आज भी इन जातियों के लोग अशिक्षित ,बेरोजगार, बेकार, बेजार ,बेघर और बेइज्जत हैं और खानाबदोश जिन्दगी जीने को अभिशप्त हैं । इस समाज की तरक्की और खुश हाली के लिए केंद्र सरकार ने 2006 में एक कमीशन बनाया जो रेणके आयोग के नाम से जाना जाता है । इसे राष्ट्रीय विमुक्त/ घूमंतू /अर्ध घूमंतू जनजाति आयोग भी कहा जाता है जिसके अध्यक्ष /चैयरमैन श्री बाल कृष्ण रेणके हैं । इस कमीशन ने केंद्र सरकार को 2008 में अपनी सिफारिशें सौंपी । अत्यंत खेदजनक है कि 5 वर्ष बीतने के बाद भी इस केंद्र की कांग्रेस सरकार रेणके कमीशन की सिफारिशें लागू नहीं कर पाई ।
वास्तव में इस कमीशन की आड़ में केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भेजे गए 2005 में 17 जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के प्रस्ताव को ठन्डे वस्ते में डालने का कार्य किया। और ये सन्देश देने का कुप्रयास किया कि सिर्फ 17 नहीं बल्कि 193 जातियों का व्यापक हित सोचा जा रहा है , चूंकि ये जातियां बहुत कम संख्यां में हैं, नेतृत्व शून्यप्राय हैं और बिखरी हुयी हैं अतः इन्हें राजनैतिक रूप से एकत्र कर पाना असंभव कार्य है । इस प्रकार प्रस्तावों और आयोगों के ढेर पर बैठ कर राजनीति करने वाली कांग्रेस ने इन जातियां का बहुत बड़ा अहित किया है ।
अब फिर 17 जातियों का उत्तर प्रदेश सरकार का प्रस्ताव केंद्र सरकार पर पहुँच गया है । बहुत संभव है कि इसे पुनः दबाने के लिए मक्कारी और अय्यारी की खाल ओढे केंद्र में बैठी कांग्रेस फिर से रेणके आयोग का शगूफा छोड़ दे ।
अरुण कुमार तुरैहा पर 10:22 pm
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